मस्ती की थी छिड़ी रागिनी, आजादी का गाना था।
भारत के कोने-कोने में, होता यही तराना था ॥
उधर खड़ी थी लक्ष्मीबाई, और पेशवा नाना था।
इधर बिहारी वीर बाँकुरा, खड़ा हुआ मस्ताना था ॥
अस्सी वर्षों की हड्डी में जागा जोश पुराना था।
सब कहते हैं कुंवर सिंह भी बड़ा वीर मर्दाना था!!
मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले, 1857 की क्रांति के महानायक, बाबू वीर कुंवर सिंह जी को उनके 163 वां विजयोत्सव पर सादर नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि!!
मातृभूमि की रक्षा के लिए उम्र का चौथापन भी कभी आडे नहीं आया, अपना हाथ काट कर माँ गंगा को समर्पित करने जैसा उदाहरण भी भारतीय इतिहास में दुसरा नहीं मिलता !
आपकी असाधारण जीवन गाथा भारत भूमि को सदैव गौरवान्वित करती रहेगी!!
🙏🙏🙏🙏 समाजसेवी विक्की सिंह राजपूत

0 Comments