कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए पुर देशभर में करीब तीन माह संपूर्ण लॉकडाउन लागू कर दिया गया था। लौकडाउन के समय सार्वजनिक परिवहन के सभी साधन-रोडवेज की बसें, ट्रेन और हवाई जहाज पूरी तरह से बंद है। भीड़भाड़ की संभावना वाली सभी जगहों- मॉल, होटल, बाजार, सिनेमा हॉल यहां तक कि स्कूल और कॉलेज भी पूरी तरह से बंद हैं। सब यह उम्मीद लगा रहे हैं और दुनियाभर के अनुभव भी यही बताते हैं कि घर में कैद रहकर ही कोरोना को हराया जा सकता है। ऐसे माहौल में देश के लाखों लोगों की आमदनी भी बंद हो गई है। प्रधानमंत्री भले ही अपील कर रहे हों कि किसी को भी नौकरी से नहीं निकाला जाए। लेकिन कड़वी सच्चाई तो यही है कि लोगों की नौकरियां जा रही हैं और जिनकी बच भी रही हैं, उन्हें वेतन में कटौती का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में बच्चों की शिक्षा के सामने भयावह संकट खड़ा हो गया है।
यह तो अब सर्वविदित तथ्य है कि देश का हर अभिवावक अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में ही पढ़ाना चाहता है। प्राइवेट स्कूलों का आलम तो यह है कि वो हर कीमत पर बच्चों की पढ़ाई के नाम पर उनके अभिभावकों की जेबें ढीली करता रहता है। शिक्षा का स्तर भले ही जो हो लेकिन ये प्राइवेट स्कूल कॉपी और किताबें महंगें दामों पर बेचते हैं। ड्रेस बेचने पर रोक लगाई गई तो इन्होंने इस बात की पुख्ता व्यवस्था कर दी कि बाहर भी अभिभावक एक ही दुकान से ड्रेस लें जो बाजार से कई गुणा ज्यादा महंगा होता ही है। दुर्भाग्यजनक स्थिति तो यह है कि कोरोना महामारी और लॉकडाउन के संकट के समय पर भी ये स्कूल अपनी मनमानी से बाज नहीं आ रहे। राजधानी पटना समेत बिहार के कई जिलों से इस तरह की खबरें आ रही हैं कि स्कूल वालों ने फीस बढ़ा दी है और पैरेंट्स पर अप्रैल-मई-जून यानि तीन महीनों की फीस एक साथ जमा करने का दबाव बनाया जा रहा है। यह महीना नई कक्षा के शुरू होने का होता है इसलिए वार्षिक शुल्क, विकास शुल्क जैसे कई शुल्क वसूलना स्कूल पहले से ही अपना अधिकार मानते आये हैं।

ऐसे कठिन और नाजुक दौर में यह जरूरी हो जाता है कि स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगाने और अभिभावकों को राहत देने के लिए सरकारें सामने आएं। राज्य सरकारें अपने स्तर पर सामने आएं। कई राज्य सरकारें इसे लेकर आगे भी आई हैं। बिहार सरकार को भी इस गंभीर बिषय पर कोई कदम उठानी चाहिए।
शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है इसलिए कोरोना महामारी के वैश्विक संकट के दौर में बेहतर तो यही होगा कि सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो क्रांफ्रेंसिंग के जरिए संवाद स्थापित कर प्रधानमंत्री कोई राष्ट्रीय नीति बनाने की पहल करें। सभी राज्य सरकारें अपने-अपने सुझाव केंद्र सरकार को दें। प्रधानमंत्री या केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री इससे जुड़े सभी पक्षों से बात करें और एक स्पष्ट राष्ट्रीय नीति की घोषणा करें जिसे सभी राज्य सरकारें लागू करें। ऐसा करते समय केंद्र सरकार को स्पष्ट तौर पर कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए-

1.  संकट की इस विकट स्थिति में सभी स्कूलों को 3 महीने की फीस पूरी तरह से माफ करने को कहा जाए। (यह आदेश सभी स्कूलों पर लागू हो और सभी अभिभावकों को इसका लाभ मिलना चाहिए। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि 3 महीने की ईएएमआई माफ करने के नाम पर बैंकों ने अपने लोन-धारकों को सिर्फ झुनझुना पकड़ा दिया है।)
2.  स्कूलों को यह भी आदेश दिया जाए कि वे अपने सभी स्टॉफ को समय पर और पूरा वेतन दें।
3.  जो भी स्कूल आर्थिक स्थिति का रोना रोयें, सरकार तुरंत उस स्कूल और उस स्कूल की पैरेंट संस्था के खातों की पूरी डिटेल मांगे और झूठ बोलने वाले स्कूलों के सभी बैंक अकाउंट को सीज कर उनके संचालकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाए।
4.  अगर किसी स्कूल की हालत वाकई खस्ता है तो सरकार अपनी तरफ से उसकी मदद भी करे।

ऐसे नाजुक और कठिन दौर में किसी को भी मनमानी करने की छूट नहीं देनी चाहिए। साथ ही सरकार को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे विकट हालात में अर्थव्यवस्था के सामान्य नियमों के सहारे देश नहीं चलाया जाना चाहिए। इसलिए जहां भी जरूरत हो, सरकारों को खुल कर मदद के लिए सामने आना चाहिए। सभी सरकारों को यह सोचना होगा कि उनका खजाना पहले अमीर लोगों के लिए खुलता था और अब गरीब लोगों के लिए खुल रहा है। देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था को हमेशा मजबूत बनाने वाले मध्यम वर्ग को संकट के इस दौर में वाकई मदद की जरूरत है और इसके लिए सरकार को नई सोच और नए इरादों के साथ नए तरह के कदम उठाने ही होंगे।