ऐसा निर्लज्ज दौर नहीं देखा कभी- अल्का बर्मा
बिहारशरीफ। पटना हाईकोर्ट के जाने-माने वकील अल्का बर्मा ने अपने फेसबुक अकाउंट पर प्रवासी मजदूरों कि घर वापसी पर व्यथा व्यक्त की।
लाखों मजदूर हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा दूरी पैदल चलकर घर लौट रहे हैं! हज़ार किलोमीटर पैदल चलकर इस गर्मी में घर आने की विवशता और हिम्मत तभी मजदूरों में आई होगी जब उन्हें लगने लगा होगा कि वो जहाँ है वहाँ और अधिक रुके तो खाने बिना मर जायेंगे या कोरोना जान लेगा! उनके मन में समाये इस डर और मजबूरी को सोचकर ही सिहर जाता हूँ!
चलते-चलते पैरों में फ़फोले पड़ जा रहे हैं! फ़फोले पड़ने के बाद वो चप्पल निकाल कर नंगे पैर चल रहे हैं! फिर धूप में जलती सड़क पर पुनः पहन रहे हैं! उनके बच्चे अटैची पर सो रहे हैं, माँ उस अटैची को खीँचकर ला रही है! एक-दो किलोमीटर नहीं, सैकड़ों किलोमीटर!
सामान कंधे पर टाँगने से कंधा छिला जा रहा है! गर्भवती महिलायें ये रिस्क लेते हुए भी कि उनका बच्चा रास्ते में पैदा हो सकता है, गर्भ में पल रहे बच्चे की अत्यधिक शारीरिक श्रम की वजह से मृत्यु हो सकती है, फिर भी इतनी दूरी तय करना चुन रही हैं! मैं शहरों से उन्हें मिल रही निराशा और संवेदनहीनता सोचकर ही गुस्से से भरा जा रहा हूँ!
कुछ ,मजदूर घर पहुँचकर कमज़ोरी के मारे मर जा रहे हैं! कुछ रस्ते में ही मर रहे हैं! कुछ घर से थोड़ी दूर पहले ही मर जा रहे हैं! बहुतों को गाड़ियाँ कुचल कर चली जा रही हैं, तो कुछ को पुलिस पीट रही है!
सबका एक ही कहना है कि उनके सारे पैसे ख़त्म हो चुके थे और इसके बाद उन्हें सरकार द्वारा मिल रही सुविधाओं पर इतना भरोसा नहीं था! कि अब और कुछ दिन शहर में रहे तो जिंदा भी बचेंगे कि नहीं! खाना भी उन्हें ऐसे दिया जा रहा है जिसमें न न्यूनतम मानवीय गरिमा है और न ही पर्याप्तता!
हज़ारों मजदूर टेम्पो में, ट्रकों में, लारियों में भेंड-बकरियों की तरह लदकर घर लौट रहे हैं! कुछ पुलिस की पिटाई की डर से मुख्य सड़क से नहीं बल्कि रेलवे ट्रैक के सहारे घर आ रहे हैं! वहाँ भी कट ही रहे हैं!
ये सब तब हो रहा है जब हम 5 ट्रिलियन इकॉनमी का सपना देख रहे हैं! दुनिया की टॉप की अर्थव्यवस्था का दंभ भरते हैं, स्पेस टेक्नोलॉजी में हम टॉप 5 देशों में शामिल हैं...और कहने को देश में सबसे पॉपुलर और मजबूत सरकार है!
बिहारशरीफ। पटना हाईकोर्ट के जाने-माने वकील अल्का बर्मा ने अपने फेसबुक अकाउंट पर प्रवासी मजदूरों कि घर वापसी पर व्यथा व्यक्त की।
लाखों मजदूर हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा दूरी पैदल चलकर घर लौट रहे हैं! हज़ार किलोमीटर पैदल चलकर इस गर्मी में घर आने की विवशता और हिम्मत तभी मजदूरों में आई होगी जब उन्हें लगने लगा होगा कि वो जहाँ है वहाँ और अधिक रुके तो खाने बिना मर जायेंगे या कोरोना जान लेगा! उनके मन में समाये इस डर और मजबूरी को सोचकर ही सिहर जाता हूँ!
चलते-चलते पैरों में फ़फोले पड़ जा रहे हैं! फ़फोले पड़ने के बाद वो चप्पल निकाल कर नंगे पैर चल रहे हैं! फिर धूप में जलती सड़क पर पुनः पहन रहे हैं! उनके बच्चे अटैची पर सो रहे हैं, माँ उस अटैची को खीँचकर ला रही है! एक-दो किलोमीटर नहीं, सैकड़ों किलोमीटर!
सामान कंधे पर टाँगने से कंधा छिला जा रहा है! गर्भवती महिलायें ये रिस्क लेते हुए भी कि उनका बच्चा रास्ते में पैदा हो सकता है, गर्भ में पल रहे बच्चे की अत्यधिक शारीरिक श्रम की वजह से मृत्यु हो सकती है, फिर भी इतनी दूरी तय करना चुन रही हैं! मैं शहरों से उन्हें मिल रही निराशा और संवेदनहीनता सोचकर ही गुस्से से भरा जा रहा हूँ!
कुछ ,मजदूर घर पहुँचकर कमज़ोरी के मारे मर जा रहे हैं! कुछ रस्ते में ही मर रहे हैं! कुछ घर से थोड़ी दूर पहले ही मर जा रहे हैं! बहुतों को गाड़ियाँ कुचल कर चली जा रही हैं, तो कुछ को पुलिस पीट रही है!
सबका एक ही कहना है कि उनके सारे पैसे ख़त्म हो चुके थे और इसके बाद उन्हें सरकार द्वारा मिल रही सुविधाओं पर इतना भरोसा नहीं था! कि अब और कुछ दिन शहर में रहे तो जिंदा भी बचेंगे कि नहीं! खाना भी उन्हें ऐसे दिया जा रहा है जिसमें न न्यूनतम मानवीय गरिमा है और न ही पर्याप्तता!
हज़ारों मजदूर टेम्पो में, ट्रकों में, लारियों में भेंड-बकरियों की तरह लदकर घर लौट रहे हैं! कुछ पुलिस की पिटाई की डर से मुख्य सड़क से नहीं बल्कि रेलवे ट्रैक के सहारे घर आ रहे हैं! वहाँ भी कट ही रहे हैं!
ये सब तब हो रहा है जब हम 5 ट्रिलियन इकॉनमी का सपना देख रहे हैं! दुनिया की टॉप की अर्थव्यवस्था का दंभ भरते हैं, स्पेस टेक्नोलॉजी में हम टॉप 5 देशों में शामिल हैं...और कहने को देश में सबसे पॉपुलर और मजबूत सरकार है!


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