स्वराज पार्टी लोकतांत्रिक के अध्यक्ष सोम प्रकाश ने लिखा पत्र हिन्दुस्तान अखबार के एडिटर इन चीफ शशि शेखर जी को।

हिन्दुस्तान अखबार में कल EDITOR IN CHIEF शशि शेखर का "महामारी के बीच आम और खास" विषयक आलेख छपा था, जो मुझे अच्छा लगा था। परंतु इसमें उन्होंने औरंगाबाद में घटित घटना का जिक्र किया था। इस पर मैंने उनको पत्र लिखते हुए इस देश में आम और खास लोगों के साथ अलग अलग हो रहे वर्ताव का जिक्र किया। साथ ही गोह के अकौना में घटित घटना की सच्चाई से अवगत कराया। प्रस्तुत है संपादक को लिखा पत्र

आदरणीय शशि शेखरजी
पहले से ही आपके आलेख को पढ़ते आया हूँ और उस पर आपके पास टिप्पणी भी भेजा हूँ और आप भी प्रत्युत्तर दिये हैं। परंतु इधर विगत वर्षो से अखबार पढ़ने के बजाये सिर्फ देख लेता था। परंतु कल के अखबार में आपका आलेख “महामारी के बीच आम और खास” छपा था जिसे मेरी पत्नी ने पढ़कर सुनाया तो उस आलेख में समाज के लिये आपकी संवेदनशीलता दिखाई दिया और आपके प्रति आदर का भाव पैदा हुआ। आप अपने आलेख में जिस संजीदगी के साथ कोरोना के इस महामारी में आम और खास के साथ अलग-अलग हो रहे वर्ताव को दर्शाते हुए चिंता जाहीर किया है काबिले तारीफ है। सही बात है कि जब एक तरफ हुकूमते लॉकडाउन लागू कर रही थी और जनता तन-मन से अनुपालन कर रही थी, तो दूसरी तरफ हमारे कुछ राजनेता इसका माखौल उड़ाने में भी जुटे थे। जिस दिन कर्नाटक के पूर्व मुख्य मंत्री एच डी कुमार स्वामी के बेटे के शादी में हजारों लोगों के शामिल होने का समाचार अखबारों में प्रमुखता से छपा था उसी दिन के अखबार में एक और समाचार छपा था कि उत्तर प्रदेश के डिबडिबा गाँव में एक गरीब जोड़े ने चुनिंद घर वाले की उपस्थिति में फेरे लिये क्योंकि पुलिस ने सोशल डिस्टेंसिंग का हवाला देकर बारात निकलने की इजाजत नहीं दी थी। आखिर कितना फर्क है आम और खास लोगो में? मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने जिस तरह शपथ-ग्रहण समारोह आयोजीत किया और सोशल डिस्टेंशिंग का माखौल उड़ा वो भूला नही है। निश्चितरूपेण जो पुलिस लॉकडाउन के दौरान मजबूरी में सड़क पर निकले साईकिल सवार को पीटती है, वही पुलिस ऐसे महानुभावों के यहां द्वारपाल का काम करती दिखती है। परंतु आप अपने आलेख के अंत में मुरादाबाद और औरंगाबाद में चिकित्सीय कार्य से गये स्वास्थ्यकर्मियों व पुलिसकर्मियों की पिटाई पर प्रश्न खड़ा किया है, उस पर औरंगाबाद के संबंध में मैं कुछ सच्चाई बताना चाहूँगा। चूँकि मैं इस जिला में बतौर थानाध्यक्ष और विधायक दोनो रह चुका हूँ। सही बात है कि औरंगाबाद में चिकित्सीय कार्य से गये स्वास्थ्यकर्मियों व पुलिसकर्मियों की पिटाई हुई है परंतु उस गाँव में रहने वाले बच्चें-बच्चियों से लेकर बूढ़े व बूढ़ी औरतों की भी बेरहमी से पिटाई हुई है। पुलिस उस गाँव के रहने वाले रामजी यादव के बेटा जो दिल्ली से आया था उसे लाने गयी थी परंतु पुलिस उस गाँव के ही दूसरे रामजी यादव के घर में घुस गयी और जबर्दस्ती करने लगी और उसके मना करने पर बाजबर्दस्ती खींचकर लाने लगी और मारपीट करने लगी तब ग्रामीणों ने अपना बचाव किया। इसके बाद क्या हुआ? शायद आपको जानकारी नहीं हो। आखिर हो भी तो कैसे? इसके बाद पूरे जिला की पुलिस-प्रशासन उस गाँव में पहुँची और अब कोरोना की बात नहीं रही ब्लकि पुलिस के काम में बाधा डालने का मामला चला और उस गाँव में जितने लोग मिले उनकी जबर्दस्त पिटाई की गयी और 44 लोगों को जेल भेजा गया। जिसमें करीब 14 महिलायें हैं और गाँव के लोगो का कहना है कि उसमें 9 महिलायें गर्भवती हैं। 11 नाबालिग भी जेल भेजे गये हैं। इस मामलें में पुलिस ने अलग-अलग 3 केस किया है और पुलिस का कहना है कि सभी को स्पीडी ट्रायल कराकर सजा कराया जायेगा और उसे जेल में ही सड़ा दिया जायेगा। पंरतु इसी बिहार में जब इंसानियत को कलंकित कर देने वाली मुजफ्फरपुर सेल्टर होम की घटना में जिसमें करीब 34 बालिकायों के साथ अलग-अलग समय व अलग-अलग स्थल पर अलग-अलग लोगों ने वर्षों तक उनका यौन-शोषण किया था जिसमें कानूनन हर दिन की घटना के लिये अलग-अलग केस किया जाना चाहिये था, फिर भी उसमें एक ही प्राथमिकी में इसी पुलिस विभाग ने अपना काम चला लिया था। इसका कारण भी श्रीमान आम और खास ही हैं। क्योंकि उस गाँव में दलित व पिछड़ी जाति के लोग निवास करते हैं और अपने जीवकोपार्जन के लिये बाहर काम करते हैं। इस घटना के संबंध में मैं अपनी भावनाओं को प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से जारी किया था परंतु अखबार के पन्नों पर उसे जगह नहीं मिल पायी। मुझे लगा कि शायद अखबार में जगह नहीं होगी। परंतु आज के हिन्दुस्तान अखबार के प्रथम पेज पर विराट कोहली और अनुष्का के ऑनलाईन लूडो खेलने का समाचार पढ़ा तो मुझे लगा कि अखबार में जगह की कमी नहीं है ब्लकि यहां भी आम और खास वाली ही भेद है। यदि उस गाँव में संभ्रांत लोग रहते तो फिर पुलिस उनके घर द्वारपाल का काम करती। और यदि गलती से भी पुलिस पीट देती तो पुलिस की बर्बरता की कहानी पूरे हिन्दुस्तान में छा जाती।