आखरी खत
भाग 1
आज न जाने क्यों सुबह से ही मन बेचैन है। रह रहकर ऐसा लग रहा है जैसे अदंर कुछ बिखर रहा है। इस बिखराव को समेटने के लिए मैं कभी बिस्तर को ठीक करती तो कभी किचन में खाने में क्या बननी है उसका विचार करती। खुद को व्यस्त रखने की पूरी कोशिश थी मेरी लेकिन जैसे जैसे शाम ढल रहा था मेरी घबराहट और बढ़ रही थी की आज न जाने क्या होगा।
ये सब सोचते सोचते न जाने कब मेरी आंख लग गई और मैं सोफे पर ही सो गई। आंख खुली तो देखा रात के 2बज रहे थे। रजत अभी तक घर नही आए थे। ये उनकी रोज की अब आदत बन गई थी। शुरु शुरु मे लेट से आते थे और मैं देरी से आने का कारण पुछती तो बात टाल जाते। लेकिन धीरे ये उनको मेरा सवाल करना खटकने लगी। हमारे बिच तनाव इस कदर बढ़ गई की अब हम एक दूसरे से बात करने से कतराने लगे।इन सब के बावजूद मुझे हमेशा ये आश जरुर थी की एक दिन सब ठीक हो जाएगा । लेकिन मेरा यकिन उस दिन चकनाचूर हो गया जिस दिन मैने रजत को कैफे में किसी अनजान लड़की के साथ देखा । मुझे लगा की हो सकता है कोई क्लाइंट होगी।
रजत का मुड आज बहुत अच्छा था। वो आफिस से आए तो मैने हमेशा की तरह उनकी फेवरेट अदरक कि कम शक्कर कम दूध कि कड़क चाय उनके सामने रखखी और सामने के सोफे पर बैठ गई।चाय की चुस्की लेते हुए मैने ही खामोशी को तोड़ते हुए पुछा। "सो आज का दिन कैसा रहा, लगता है आज डील मील गई आपको। " रजत ने सवालिया निगाह से मुझे देखा। मैने फिर बात आगे बढ़ाई और कहा "अरे मै उस डील की बात कर रही हुं, जो आज कैफे मे थी, मैने देखा था आपको"। रजत को पता नही अचानक क्या हुआ, वे गुस्से से आग बबुला हो गए और कहने लगे, " औ तो अब मेरी जसूसी होने लगी है"। "नही रजत ऐसा नही है, मैं तो बस...... " मैनें अपनी बात पूरी भी नही कि थी की वो वहां से उठकर चले गए और छोड़ गए लम्बी खामोशी।
दिन किसी तरह बीत ही रहे थे की अचानक ही एक दिन उनका मेसेज आया। "रेनु बहुत कोशिश की मैने, लेकिन अब नही हो रहा है। थींग्स आर नौट गुड बीटबीन अस, लेट्स गेट सेपरेटेड"। सेपरेटेड.... क्या इतना आसान है अलग हो जाना। मै बुदबुदाते हुए नीचे बैठ गई। आखिर ऐसा क्या हो गया जो रजत ने ऐसा फैसला लिया। एक बार तो बात करते, यूं अचानक... मैं खुद से ही सवाल जवाव करने लगी और कोसने लगी खुद को की जरूर मेरी ही कोई बात रजत को बुरी लगी होगी, पर क्या..... सोंच सोंचकर दिल बैठा जा रहा की सहसा कैफै वाला दिन आंखो के सामने से गुजरा। क्या वो सच में कलाइन्ट थी, तो फिर रजत भड़के क्यों थे उसका जिक्र आते ही। नही वो कुछ और था जो शायद मैं देख नही पाई थी या सबकुछ आंखो के सामने होते हुए भी मैनें आंखे बंद की हुई थी तभी तो रजत कि झल्लाहट समझ नही पाई।
पूरी रात बीत गई, रजत घर नही आऐ। सुबह आई तो बस एक सफेद लिफाफा जो रजत ने अपने आफिस के पिउन से भिजवाई थी। उसे खोलते वक्त मेरे हाथ पैर कांप रहे थे। लेकिन पूरी हिम्मत जुटाकर मैंने लिफाफे को खोला और उसके अदंर से जो निकला उससे मेरे पैरों तले से जमीन निकल गई। वो था हमारे रिश्ते की दम तोड़ती आखरी सांस, रजत ने मुझे तलाक का नोटिस भेजा था।
" अब आपलोग ही बताईए की रेणू को अब आगे क्या कर निर्दोष चाहिए "।
आखरी खत
भाग 2
वो कहते है न चाहे पूरी दुनिया घूम लो, सुकुन अपने घर आकर ही मिलता है। अपना घर..... बहुत मुश्किल है एक लड़की के लिए ये तय करना कि आखिर उसका अपना घर है कौन सा, वो घर जहाँ उसने जन्म लिया, जहाँ पहली बार साइकल चलाना सिखा, गलती करने पर मां के आंचल के पीछे छीपी , भाइयों ने चोटी खींची और रोने पर मनचाही चिज़ दिलाया, जहाँ पापा की थकान बस उसकी एक मुस्कान देखकर मिट जाति थी, या वो घर जहाँ भेजने का सपना दादी कि आंखे तो देखती थी लेकिन दिल साथ नही देता था, वो घर जहां कहने को तो सब अपने थे लेकिन अपनापन जैसा कुछ नही थाऔर खुद को ऐसे इंसान को सौंप देना जिसे आपके के लिए चूना गया हो,जो आपके लिए बिल्कुल नया है। लेकिन एक अनजान को अपना मान लेना ये लड़कियों को कोई सिखाता नही है, ये तो उसे खुद ही आ जाता है। अजब सा झुकाव होता उस इंसान के लिए जिसे न जाने कब वह अपना सबकुछ मान चुकी होती है और बदले मैं क्या उम्मिद करती है बस थोड़ा सा प्यार और अपना आत्मसम्मान को बनाए रखने की आज़ादी। लेकिन जब उससे ये उम्मिद छीन ली जाति है तो उसकी दुनिया ही मानो उजड़ जाति है। ऐसा लगता है की मानो अब कुछ बचा ही नही हो जीवन में इस दुख के अलावा, कि अब आप अकेले हो इस दुनिया में।
सच में शादी के बाद एक लड़की के लिए सबकुछ बदल जाता है। ससुराल अपना और माइका स्वत: पराया सा हो जाता है। सच एक लड़की अपने एक जीवन काल में कई ज़िदगी जी लेती है। मैं भी इससे अछूती कहा थी। जन्म लिया तो बेटी बनी, बहन बनने का भी सुख मिला, दादा दादी की सोन चिड़ईया बन भी खुब लाड़ लूटा। फिर शादी ने पत्नि , बहू, भाभी जैसे रिश्ते कि डोर से मैं बंध गई। सच कहूँ तो इस बंधन से मुझे एतराज नही था लेकिन जब बंधन आपको अपनी आगोश में जकड़ने लगे तब इस दम घूटते रिश्ते को तोड़ ही देना बेहतर होता है। लेकिन लड़कीयों के लिए ये सब कहां आसान होता है, हाँ रजत जैसे मर्द जिन्हें खुद के अलावा कोई और नज़र ही नहीं आता है वो जरूर ऐसा कर सकते है।उनके लिए आई, मी, माइसेल्फ वाली थेय्री ही मायने रखती है। आखिर कब तक कोई इस तरह के दकियानूसी ख्यालों को झेलता, बरदास्त की भी कोई सीमा होती है कि नही। लेकिन औरत आवाज उठाए ये इन मर्दों को कहा गवारा होता है। इसी की तो सजा़ आज मुझे तलाक के कागज़ के रूप में मिली थी।
खैर, अब ये सोचने का समय निकल चूका था। आगे क्या करना है ये सोचना जरूरी है। सारी हिम्मत को बटोरते हुए रेणू अपनी जगह से उठी और फोन से एक न० डाइल किया और बस इतना कहा "मिलना है अभि, आ रही हूँ"।
क्या लगता है आपको, रेणू ने किसे फोन किया होगा और वो किस्से मिलने जा रही है।
आखरी खत
भाग 3
मन भी कितना चंचल होता है, कब क्या चाह ले कहा नही जा सकता है। इस चाहत में कभी कभी उन चिजों पर हमारा ध्यान ही नही जाता है जो हमारे आत्मसम्मान को दीमक की तरह खोखला कर रही होती है। ऐसा ही तो हो रहा था मेरे साथ हर उस दिन जब रजत के मज़ाक में दिए गए तानों को मैनें कभी प्यार तो कभी वयस्ता समझा। ऐसा ही एक दिन था जब खाना बनाकर मैं रजत को खाने के लिए बुलाने गई, वो फोन पर किसी से बात कर रहे था सो उन्होनें हाथ से दो मिनट का इशारा करते मुझे जाने को कहा। करिब आधे घंटे बाद जब वे आए तो थोड़े परेशान से दिखे। मैंने कारण पुछा तो हंसकर बोले "परेशान होता हूँ तभी घर में रोटी आती है, बैठे बैठे नहीं"। उस दिन से इस तरह के ताने मुझे अब लगभग अब रोज सुनने को मिलने लगी और मैं हर बार उन्हे ये सोचकर टालती रही कि रजत परेशान होंगे, कि आफिस में काम ज्यादा होगा, कि मैंने ही कुछ गलती कि होगी वगैरा वगैरा। लेकिन यह मेरी सबसे बड़ी भूल थी। वो कहते हैं न अपना आत्मसम्मान बनाए रखना हमारी खुद की जिम्मेदारी होती है। कोई आपको तब तक ठेस नही पहुचा सकता है जबतक आप उन्हें ऐसा करने कि इजाज़त न दें। हां गलती मेरी ही थी कि मैंने रजत को इतना हक दे दिया कि वो मुझे चोट पहुंचा सके। मन का चोट तन के चोट से भी गहरा और दर्द देने वाला होता है। इसी दर्द को लिए मैं आज नेहा जिसके साथ रजत आजकल अपनी दुनिया बसा रहे थे, जिसके लिए उन्होने मुझे छोड़ने को तयार थे से मिलने जा रही थी। नेहा के घर के बाहर पहुँचते ही सबसे पहले मैंने एक गहरी सांस ली और हिम्मत बटोरते हुए घर की डोरबेल बजाई। दरवाजा नेहा ने खोला और मुझे अंदर आने को कहा। अंदर रजत भी मौजू़द थे। उनको देख एक बार को मैं ठीठकी लेकिन फिर पुरी हिम्मत से कहा, "नाइस हाउस"। ये बोलकर मैं सोफे पर बैठ गई। रजत लगातार सवालिया निगाहों से मुझे देखे जा रहे थे और जब नहीं रहा गया तो खीज़कर बोले " क्या चाहिए रेणू, क्यों आई हो? तलाक चाहिए, वही देने आई हूँ "। ये कहते हुए मैंने तलाक के पेपर पर साइन किया और पेपर वहीं छोड़कर बाहर जाने लगी। अचानक रुकी और पलटकर नेहा को देखा और बस इतना कहा " आल द बेस्ट" ,और हां से निकल गई।रजत स्बध होकर मुझे एक लगातार मुझे देखते ही रहे मानो सोच रहे हो की आखिर हुआ क्या। मुझे न जाने क्यों ये देखकर बहुत दिल को सुकुन मिल रहा था, बहुत हलका महसूस कर रही थी। मैंने रीक्सा रुकवाया और उसपर बैठकर अपनी नई जिन्दगी की ओर चल पड़ी।
"क्या लगता है आपको रेणू ने रज़त से बिना बिना कोई सवाल कीए इतनी आसानी से तलाक क्यों दे दिया"। और अब उसकी आगे कि जिन्दगी कैसी होगी"।
आखरी खत
भाग 4
वो कहते है न मन के हारे हार, मन के जीते जीत। कुछ ऐसा ही आज मैं अनुभव कर रही थी। आज तक जो भी तकलिफे मैंनें सही है, भले वो मुझे रजत ने दिया था लेकिन उसे सहने का फैसला मेरा था। मेरी सिसकियां रजत ने भले कभी न सुनी हो लेकिन उसे मैने भी कहां सुना कभी। बस इसी भ्रम में जीती रही की सब ठीक हो जाएगा। लेकिन ऐसा कभी न हुआ और शायद होता भी नहीं ,मेरा भ्रम कभी टुटता भी नहीं अगर रजत मुझे ये तलाक का कागज नहीं भेजते।
हां शुरू मे ये यकिन कर पाना मेरे लिए मुश्किल जरुर था की ये मेरे साथ हुआ है, की ये कैसे हुआ, क्यों हुआ, रजत ऐसा नहीं कर सकते हैं, जरुर कुछ गलतफहमी होगी। मैनें तो यह तक सोंच लिया था कि कल उनसे अपनी गलतियों के लिए माफी मांग लूंगी। लेकिन सहसा मैं कब आइने के पास आ खड़ी हुई और आते ही ठिठकी। खुद को खुद से मिलते देख मेरे मन में एक सवाल कौंधा। "माफी, लेकिन किस बात की, मैंने ऐसी कौनसी गलती की है जिसकी मुझे माफी मांगनी चाहिए। क्या मेरी गलती ये थी मैंने अपने पिता के पसंद को अपनी पसंद समझा, या ये कि मैंने पूरी सिद्दत से रजत को चाहा, उन्हे अपना माना या फिर ये सब करना ही मेरी सबसे बड़ी गलती थी। हां, ये सब करना ही मेरी सबसे बड़ी गलती थी। और मुझे रजत से नहीं खुद से माफी मांगनी चाहिए की मैंने किसी को इतना हक क्यों दिया कि वो मुझे इतना चोट पहुचां सके। लेकिन अब नहीं, अब और कोई मुझे र्दद नहीं दे सकता है और अगर कोई ऐसा करने की कोशिश भी करेगा तो उसे इस बदली हुई रेणू का सामना करना पड़ेगा। जो अब मुंहतोड़ जवाब देना जानती है।
नेहा के घर से बाहर निकलते समय जितना रजत हैरान था मैं उतना ही संतुष्ट और हलका महसूस कर रही थी। लग रहा था मानों मैने रजत को नही खुद के दुखों को तलाक दिया। जो इतने दिनों से र्दद से भरा मन था आज पूरी तरह से खाली हो गया नए अच्छे यादों से भरने के लिए।
समाप्त।।।।
Written By Shweta Sinha.
भाग 1
आज न जाने क्यों सुबह से ही मन बेचैन है। रह रहकर ऐसा लग रहा है जैसे अदंर कुछ बिखर रहा है। इस बिखराव को समेटने के लिए मैं कभी बिस्तर को ठीक करती तो कभी किचन में खाने में क्या बननी है उसका विचार करती। खुद को व्यस्त रखने की पूरी कोशिश थी मेरी लेकिन जैसे जैसे शाम ढल रहा था मेरी घबराहट और बढ़ रही थी की आज न जाने क्या होगा।
ये सब सोचते सोचते न जाने कब मेरी आंख लग गई और मैं सोफे पर ही सो गई। आंख खुली तो देखा रात के 2बज रहे थे। रजत अभी तक घर नही आए थे। ये उनकी रोज की अब आदत बन गई थी। शुरु शुरु मे लेट से आते थे और मैं देरी से आने का कारण पुछती तो बात टाल जाते। लेकिन धीरे ये उनको मेरा सवाल करना खटकने लगी। हमारे बिच तनाव इस कदर बढ़ गई की अब हम एक दूसरे से बात करने से कतराने लगे।इन सब के बावजूद मुझे हमेशा ये आश जरुर थी की एक दिन सब ठीक हो जाएगा । लेकिन मेरा यकिन उस दिन चकनाचूर हो गया जिस दिन मैने रजत को कैफे में किसी अनजान लड़की के साथ देखा । मुझे लगा की हो सकता है कोई क्लाइंट होगी।
रजत का मुड आज बहुत अच्छा था। वो आफिस से आए तो मैने हमेशा की तरह उनकी फेवरेट अदरक कि कम शक्कर कम दूध कि कड़क चाय उनके सामने रखखी और सामने के सोफे पर बैठ गई।चाय की चुस्की लेते हुए मैने ही खामोशी को तोड़ते हुए पुछा। "सो आज का दिन कैसा रहा, लगता है आज डील मील गई आपको। " रजत ने सवालिया निगाह से मुझे देखा। मैने फिर बात आगे बढ़ाई और कहा "अरे मै उस डील की बात कर रही हुं, जो आज कैफे मे थी, मैने देखा था आपको"। रजत को पता नही अचानक क्या हुआ, वे गुस्से से आग बबुला हो गए और कहने लगे, " औ तो अब मेरी जसूसी होने लगी है"। "नही रजत ऐसा नही है, मैं तो बस...... " मैनें अपनी बात पूरी भी नही कि थी की वो वहां से उठकर चले गए और छोड़ गए लम्बी खामोशी।
दिन किसी तरह बीत ही रहे थे की अचानक ही एक दिन उनका मेसेज आया। "रेनु बहुत कोशिश की मैने, लेकिन अब नही हो रहा है। थींग्स आर नौट गुड बीटबीन अस, लेट्स गेट सेपरेटेड"। सेपरेटेड.... क्या इतना आसान है अलग हो जाना। मै बुदबुदाते हुए नीचे बैठ गई। आखिर ऐसा क्या हो गया जो रजत ने ऐसा फैसला लिया। एक बार तो बात करते, यूं अचानक... मैं खुद से ही सवाल जवाव करने लगी और कोसने लगी खुद को की जरूर मेरी ही कोई बात रजत को बुरी लगी होगी, पर क्या..... सोंच सोंचकर दिल बैठा जा रहा की सहसा कैफै वाला दिन आंखो के सामने से गुजरा। क्या वो सच में कलाइन्ट थी, तो फिर रजत भड़के क्यों थे उसका जिक्र आते ही। नही वो कुछ और था जो शायद मैं देख नही पाई थी या सबकुछ आंखो के सामने होते हुए भी मैनें आंखे बंद की हुई थी तभी तो रजत कि झल्लाहट समझ नही पाई।
पूरी रात बीत गई, रजत घर नही आऐ। सुबह आई तो बस एक सफेद लिफाफा जो रजत ने अपने आफिस के पिउन से भिजवाई थी। उसे खोलते वक्त मेरे हाथ पैर कांप रहे थे। लेकिन पूरी हिम्मत जुटाकर मैंने लिफाफे को खोला और उसके अदंर से जो निकला उससे मेरे पैरों तले से जमीन निकल गई। वो था हमारे रिश्ते की दम तोड़ती आखरी सांस, रजत ने मुझे तलाक का नोटिस भेजा था।
" अब आपलोग ही बताईए की रेणू को अब आगे क्या कर निर्दोष चाहिए "।
आखरी खत
भाग 2
वो कहते है न चाहे पूरी दुनिया घूम लो, सुकुन अपने घर आकर ही मिलता है। अपना घर..... बहुत मुश्किल है एक लड़की के लिए ये तय करना कि आखिर उसका अपना घर है कौन सा, वो घर जहाँ उसने जन्म लिया, जहाँ पहली बार साइकल चलाना सिखा, गलती करने पर मां के आंचल के पीछे छीपी , भाइयों ने चोटी खींची और रोने पर मनचाही चिज़ दिलाया, जहाँ पापा की थकान बस उसकी एक मुस्कान देखकर मिट जाति थी, या वो घर जहाँ भेजने का सपना दादी कि आंखे तो देखती थी लेकिन दिल साथ नही देता था, वो घर जहां कहने को तो सब अपने थे लेकिन अपनापन जैसा कुछ नही थाऔर खुद को ऐसे इंसान को सौंप देना जिसे आपके के लिए चूना गया हो,जो आपके लिए बिल्कुल नया है। लेकिन एक अनजान को अपना मान लेना ये लड़कियों को कोई सिखाता नही है, ये तो उसे खुद ही आ जाता है। अजब सा झुकाव होता उस इंसान के लिए जिसे न जाने कब वह अपना सबकुछ मान चुकी होती है और बदले मैं क्या उम्मिद करती है बस थोड़ा सा प्यार और अपना आत्मसम्मान को बनाए रखने की आज़ादी। लेकिन जब उससे ये उम्मिद छीन ली जाति है तो उसकी दुनिया ही मानो उजड़ जाति है। ऐसा लगता है की मानो अब कुछ बचा ही नही हो जीवन में इस दुख के अलावा, कि अब आप अकेले हो इस दुनिया में।
सच में शादी के बाद एक लड़की के लिए सबकुछ बदल जाता है। ससुराल अपना और माइका स्वत: पराया सा हो जाता है। सच एक लड़की अपने एक जीवन काल में कई ज़िदगी जी लेती है। मैं भी इससे अछूती कहा थी। जन्म लिया तो बेटी बनी, बहन बनने का भी सुख मिला, दादा दादी की सोन चिड़ईया बन भी खुब लाड़ लूटा। फिर शादी ने पत्नि , बहू, भाभी जैसे रिश्ते कि डोर से मैं बंध गई। सच कहूँ तो इस बंधन से मुझे एतराज नही था लेकिन जब बंधन आपको अपनी आगोश में जकड़ने लगे तब इस दम घूटते रिश्ते को तोड़ ही देना बेहतर होता है। लेकिन लड़कीयों के लिए ये सब कहां आसान होता है, हाँ रजत जैसे मर्द जिन्हें खुद के अलावा कोई और नज़र ही नहीं आता है वो जरूर ऐसा कर सकते है।उनके लिए आई, मी, माइसेल्फ वाली थेय्री ही मायने रखती है। आखिर कब तक कोई इस तरह के दकियानूसी ख्यालों को झेलता, बरदास्त की भी कोई सीमा होती है कि नही। लेकिन औरत आवाज उठाए ये इन मर्दों को कहा गवारा होता है। इसी की तो सजा़ आज मुझे तलाक के कागज़ के रूप में मिली थी।
खैर, अब ये सोचने का समय निकल चूका था। आगे क्या करना है ये सोचना जरूरी है। सारी हिम्मत को बटोरते हुए रेणू अपनी जगह से उठी और फोन से एक न० डाइल किया और बस इतना कहा "मिलना है अभि, आ रही हूँ"।
क्या लगता है आपको, रेणू ने किसे फोन किया होगा और वो किस्से मिलने जा रही है।
आखरी खत
भाग 3
मन भी कितना चंचल होता है, कब क्या चाह ले कहा नही जा सकता है। इस चाहत में कभी कभी उन चिजों पर हमारा ध्यान ही नही जाता है जो हमारे आत्मसम्मान को दीमक की तरह खोखला कर रही होती है। ऐसा ही तो हो रहा था मेरे साथ हर उस दिन जब रजत के मज़ाक में दिए गए तानों को मैनें कभी प्यार तो कभी वयस्ता समझा। ऐसा ही एक दिन था जब खाना बनाकर मैं रजत को खाने के लिए बुलाने गई, वो फोन पर किसी से बात कर रहे था सो उन्होनें हाथ से दो मिनट का इशारा करते मुझे जाने को कहा। करिब आधे घंटे बाद जब वे आए तो थोड़े परेशान से दिखे। मैंने कारण पुछा तो हंसकर बोले "परेशान होता हूँ तभी घर में रोटी आती है, बैठे बैठे नहीं"। उस दिन से इस तरह के ताने मुझे अब लगभग अब रोज सुनने को मिलने लगी और मैं हर बार उन्हे ये सोचकर टालती रही कि रजत परेशान होंगे, कि आफिस में काम ज्यादा होगा, कि मैंने ही कुछ गलती कि होगी वगैरा वगैरा। लेकिन यह मेरी सबसे बड़ी भूल थी। वो कहते हैं न अपना आत्मसम्मान बनाए रखना हमारी खुद की जिम्मेदारी होती है। कोई आपको तब तक ठेस नही पहुचा सकता है जबतक आप उन्हें ऐसा करने कि इजाज़त न दें। हां गलती मेरी ही थी कि मैंने रजत को इतना हक दे दिया कि वो मुझे चोट पहुंचा सके। मन का चोट तन के चोट से भी गहरा और दर्द देने वाला होता है। इसी दर्द को लिए मैं आज नेहा जिसके साथ रजत आजकल अपनी दुनिया बसा रहे थे, जिसके लिए उन्होने मुझे छोड़ने को तयार थे से मिलने जा रही थी। नेहा के घर के बाहर पहुँचते ही सबसे पहले मैंने एक गहरी सांस ली और हिम्मत बटोरते हुए घर की डोरबेल बजाई। दरवाजा नेहा ने खोला और मुझे अंदर आने को कहा। अंदर रजत भी मौजू़द थे। उनको देख एक बार को मैं ठीठकी लेकिन फिर पुरी हिम्मत से कहा, "नाइस हाउस"। ये बोलकर मैं सोफे पर बैठ गई। रजत लगातार सवालिया निगाहों से मुझे देखे जा रहे थे और जब नहीं रहा गया तो खीज़कर बोले " क्या चाहिए रेणू, क्यों आई हो? तलाक चाहिए, वही देने आई हूँ "। ये कहते हुए मैंने तलाक के पेपर पर साइन किया और पेपर वहीं छोड़कर बाहर जाने लगी। अचानक रुकी और पलटकर नेहा को देखा और बस इतना कहा " आल द बेस्ट" ,और हां से निकल गई।रजत स्बध होकर मुझे एक लगातार मुझे देखते ही रहे मानो सोच रहे हो की आखिर हुआ क्या। मुझे न जाने क्यों ये देखकर बहुत दिल को सुकुन मिल रहा था, बहुत हलका महसूस कर रही थी। मैंने रीक्सा रुकवाया और उसपर बैठकर अपनी नई जिन्दगी की ओर चल पड़ी।
"क्या लगता है आपको रेणू ने रज़त से बिना बिना कोई सवाल कीए इतनी आसानी से तलाक क्यों दे दिया"। और अब उसकी आगे कि जिन्दगी कैसी होगी"।
आखरी खत
भाग 4
वो कहते है न मन के हारे हार, मन के जीते जीत। कुछ ऐसा ही आज मैं अनुभव कर रही थी। आज तक जो भी तकलिफे मैंनें सही है, भले वो मुझे रजत ने दिया था लेकिन उसे सहने का फैसला मेरा था। मेरी सिसकियां रजत ने भले कभी न सुनी हो लेकिन उसे मैने भी कहां सुना कभी। बस इसी भ्रम में जीती रही की सब ठीक हो जाएगा। लेकिन ऐसा कभी न हुआ और शायद होता भी नहीं ,मेरा भ्रम कभी टुटता भी नहीं अगर रजत मुझे ये तलाक का कागज नहीं भेजते।
हां शुरू मे ये यकिन कर पाना मेरे लिए मुश्किल जरुर था की ये मेरे साथ हुआ है, की ये कैसे हुआ, क्यों हुआ, रजत ऐसा नहीं कर सकते हैं, जरुर कुछ गलतफहमी होगी। मैनें तो यह तक सोंच लिया था कि कल उनसे अपनी गलतियों के लिए माफी मांग लूंगी। लेकिन सहसा मैं कब आइने के पास आ खड़ी हुई और आते ही ठिठकी। खुद को खुद से मिलते देख मेरे मन में एक सवाल कौंधा। "माफी, लेकिन किस बात की, मैंने ऐसी कौनसी गलती की है जिसकी मुझे माफी मांगनी चाहिए। क्या मेरी गलती ये थी मैंने अपने पिता के पसंद को अपनी पसंद समझा, या ये कि मैंने पूरी सिद्दत से रजत को चाहा, उन्हे अपना माना या फिर ये सब करना ही मेरी सबसे बड़ी गलती थी। हां, ये सब करना ही मेरी सबसे बड़ी गलती थी। और मुझे रजत से नहीं खुद से माफी मांगनी चाहिए की मैंने किसी को इतना हक क्यों दिया कि वो मुझे इतना चोट पहुचां सके। लेकिन अब नहीं, अब और कोई मुझे र्दद नहीं दे सकता है और अगर कोई ऐसा करने की कोशिश भी करेगा तो उसे इस बदली हुई रेणू का सामना करना पड़ेगा। जो अब मुंहतोड़ जवाब देना जानती है।
नेहा के घर से बाहर निकलते समय जितना रजत हैरान था मैं उतना ही संतुष्ट और हलका महसूस कर रही थी। लग रहा था मानों मैने रजत को नही खुद के दुखों को तलाक दिया। जो इतने दिनों से र्दद से भरा मन था आज पूरी तरह से खाली हो गया नए अच्छे यादों से भरने के लिए।
समाप्त।।।।
Written By Shweta Sinha.


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